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  प्रोफेसर ललन झा की बड़ी अभिलाषा थी की वो अपने बचपन के शहर दरभंगा में कोई सिनेमा देखें I अपना बचपन दरभंगा और जवानी दिल्ली में बिताने वाले ललन कुछ उन अभागों में से थे जो त्रिशंकु की तरह न तो दिल्ली और न ही दरभंगा को पूरी तरह से अपना सके थे I यह एक बड़ी दुख्दायी अवस्था थी, जिसका उन्हें ज्ञात था, इसीलिए जब भी मौक़ा मिला, शहर के मोह पाश को छोड़ दरभंगा में कुछ नई आस लिए पहुँच जाते I उनकी यह भूख रहस्यमयी ग्रहों की खोज जैसी थी, जिसपर सालों से जीवन की खोज को ढूंढने की अभिलाषा लिए कई वैज्ञानिक अपना तन मन लगाएं बैठे हैं, एक   ऐसी भूख जो आपको जगाये रखे पर कभी शांत न हो I                           कईयों बार उनकी दरभंगा यात्रा सफलता और असफलता के बीच कहीं गुम हो जाती, जहां उसका अर्थ खुद ललन के लिए निकाल पाना बड़ा मुश्किल हो जाता, इसीलिए जब इस बार उन्होंने स्वतन्त्रता सेनानी एक्सप्रेस के शयनयान की टिकट कटाई, मन में पहले से ही ठान लिया,   लेंगे तो ऊपर की शीट I आप सोचते होंगे क्यूँ? ललन का तर्क   वास्तु से कितना मेल खाता ...